• Sunday, 08 February 2026
पुण्यतिथि पर विशेष : जब दलितों के मंदिर प्रवेश का ब्राह्मणों ने किया था विरोध

पुण्यतिथि पर विशेष : जब दलितों के मंदिर प्रवेश का ब्राह्मणों ने किया था विरोध

Vikas

पुण्यतिथि पर विशेष : जब दलितों के मंदिर प्रवेश का ब्राह्मणों ने किया था विरोध 

अरुण साथी

डॉ. श्रीकृष्ण सिंह, जिन्हें आदरपूर्वक “श्रीबाबू” कहा जाता है, बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री और आधुनिक बिहार के निर्माता माने जाते हैं। उनका जन्म 21 अक्टूबर 1887 को मुंगेर ज़िले के बरबीघा प्रखंड के माउर गाँव में हुआ। वे स्वतंत्रता आंदोलन के प्रखर सेनानी, कुशल प्रशासक और सामाजिक न्याय के पक्षधर नेता थे।

डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने गांधीजी के नेतृत्व में असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। कई बार जेल गए, परंतु उनके संकल्प कभी डगमगाए नहीं। स्वतंत्रता के बाद 1946 में वे बिहार के मुख्यमंत्री बने और 1961 तक इस पद पर रहे। यह बिहार के इतिहास का सबसे स्थिर और निर्णायक शासनकाल माना जाता है।

डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने सामाजिक समानता को केवल विचार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे व्यवहार में उतारा। 1948 में देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम मंदिर में दलितों के प्रवेश का निर्णय उनके इसी प्रगतिशील दृष्टिकोण का उदाहरण है। उस समय मंदिरों में दलितों का प्रवेश वर्जित था और इस मुद्दे पर समाज में तीखा विरोध भी था।

मुख्यमंत्री रहते हुए श्रीबाबू ने स्पष्ट कहा कि लोकतंत्र और स्वतंत्र भारत में किसी भी नागरिक को जाति के आधार पर धार्मिक स्थलों से वंचित नहीं किया जा सकता। उन्होंने प्रशासनिक दृढ़ता के साथ यह सुनिश्चित किया कि देवघर मंदिर के द्वार दलितों के लिए भी खुलें। यह निर्णय केवल एक मंदिर प्रवेश नहीं था, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक भेदभाव की दीवार पर प्रहार था।

इस कदम के विरोध में कई रूढ़िवादी ताकतें सामने आईं, पर डॉ. श्रीकृष्ण सिंह अपने फैसले पर अडिग रहे। उनका मानना था कि जब तक सामाजिक समानता नहीं होगी, तब तक राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी।

देवघर मंदिर में दलित प्रवेश का यह निर्णय उन्हें सच्चे अर्थों में सामाजिक न्याय का अग्रदूत सिद्ध करता है और भारतीय सामाजिक सुधार के इतिहास में उन्हें विशिष्ट स्थान दिलाता है।

बिहार में जमींदारी उन्मूलन कानून लागू करना आसान नहीं था। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह स्वयं उच्च जाति से आते थे, और बिहार के अधिकांश बड़े जमींदार भी उनकी ही स्वजातीय पृष्ठभूमि से थे। इसके बावजूद उन्होंने किसान हित को जातिगत हित से ऊपर रखा। जमींदारी उन्मूलन के निर्णय के बाद उन्हें अपने ही समाज के प्रभावशाली जमींदारों का तीखा विरोध, सामाजिक बहिष्कार और राजनीतिक दबाव झेलना पड़ा।

कई जमींदारों ने इस कानून को अपनी “परंपरागत सत्ता” पर हमला माना। निजी स्तर पर श्रीबाबू पर दबाव बनाया गया, आलोचनाएँ हुईं और उन्हें “अपनी जाति के विरुद्ध” जाने वाला तक कहा गया। फिर भी उन्होंने स्पष्ट कहा कि “यदि न्याय जाति से टकराए, तो जाति नहीं, न्याय बचेगा।”

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1950 में बिहार में जमींदारी उन्मूलन अधिनियम लागू हुआ, जिसने लाखों किसानों को भूमि का अधिकार दिलाया। यह निर्णय श्रीकृष्ण सिंह को केवल प्रशासक नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का नेतृत्वकर्ता सिद्ध करता है। उनका यह संघर्ष आज भी बताता है कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो निजी और जातिगत हितों से ऊपर उठकर जनहित का पक्ष ले।

मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन कर किसानों को भूमि का अधिकार दिलाया। शिक्षा, सिंचाई, उद्योग और सामाजिक समरसता को उन्होंने विशेष प्राथमिकता दी। दलितों और पिछड़ों के उत्थान के लिए उनके प्रयास उल्लेखनीय रहे। उन्होंने कानून-व्यवस्था को मजबूत किया और जातिवाद व सांप्रदायिकता के विरुद्ध कठोर रुख अपनाया।

डॉ. श्रीकृष्ण सिंह सादगी, ईमानदारी और दृढ़ इच्छाशक्ति के प्रतीक थे। 31 जनवरी 1961 को उनका निधन हुआ, किंतु उनका जीवन आज भी बिहार की राजनीति और प्रशासन के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है।

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