• Sunday, 31 August 2025
हर गांव में बिगाड़ने वाला एक भूषण होता है, पढ़िए वेब सीरीज पंचायत की पंचैती

हर गांव में बिगाड़ने वाला एक भूषण होता है, पढ़िए वेब सीरीज पंचायत की पंचैती

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हर गांव में बिगाड़ने वाला एक भूषण होता है, पढ़िए वेब सीरीज पंचायत की पंचैती

 

अरुण साथी:

 

#वेब_सीरीज पंचायत। गांव । जवार। देहात । सहज । लंपट । लाज बीज। छिल्ल बांस। थकुच देना। यही सब है। मतलब शुद्ध गांव । आठ किस्तों का सीरीज है । इसके कथानक, संवाद, अभिनय, प्रेम, राजनीति और गोर खिंचवा भूषण । सब कुछ ऐसा ही है, जैसा गांव होता है। भदेस।

 

बिल्कुल सहज और सामान्य। सबसे पहले यह की पंचायत उन तमाम सिनेमा निर्माताओं, ओटीटी के लठैत को जो गोली गाली को परोसते है; उनके मुंह पर कालिख पोतता है। जो यह कहते हैं कि लोग अश्लीलता ही देखना चाहते हैं।  

 

और भोजपुरी सिनेमा के चिरकुट निर्माता, निर्देशक और अभिनेता, अभिनेत्री को तो पंचायत चुल्लू भर पानी में डूबने के लिए आमंत्रित करता है। डूब मरो । 

 

अब आगे की बात पंचायत की । तीसरी किस्त में प्रहलाद चा छा गए। गांव का देवता आदमी। विकास, सचिव जी, रिंकी, सबने छाप छोडी। प्रधान जी और उनकी बीवी। रघुवीर यादव और नीना गुप्ता। नाम ही काफी है ।

 

विनोद और भूषण। गांव के आदमी को जी लिया है। भूषण मतलब गांव का वह आदमी जो हर गांव टोला में होता है। उसे बिगाड़ने वाला कहा जाता है। लड़ाई लगाना । चुगली करना। यही उसकी विशेषता होती है। वही भूषण में है। यदि गांव में भूषण जैसा आदमी नहीं हो तो गांव सचमुच में बहुत बेहतर जगह हो । विनोद तो बस गांव का भोला आदमी । 

 

कुत्ता मार कर खाने वाला और घोड़ा पालने वाला सनकपराकी विधायक तो खैर होता ही है पर गांव का साधारण आदमी राम बहादुर का विधायक से डटकर लड़ना, सच्ची घटना है। गांव में बम बहादुर होता ही है। सच्चा, ईमानदार और साहसी। बुढ़िया दादी और उनका पोता ने तो गजब कर दिया है। विकास ने तो सच में बिहार काे जी लिया।

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 सचिव जी और रिंकी । दोनों के माध्यम से कथाकार ने प्रेम का ऐसा तना-बाना बुना कि हर गांव का युवा इसमें खुद को ढूंढता नजर आएगा। सचिव जी और रिंकी बेचारे। सालों से प्रेम तो है पर अभिव्यक्त का साहस नहीं कर पाते। आंखों से आंखों की बातचीत। गांव का प्रेम यही तो है । निश्छल। कुल मिलाकर पंचायत का तीसरा चरण भी सुपरहिट रहा।

 

हां, कई कमियां भी है। सबसे पहले गांव को दिखाने पर भी लोगों की संख्या बहुत कम रखी गई है। जबकि गांव में हजार - पांच सौ लोग ऐसे ही दिख जाते हैं। खर्च बचाने के लिए कम लोगों में ही सारा सीरीज बना दिया गया। 

 

शुरुआत में बांस को छील कर नए सचिव को डराने और ज्वाइन नहीं करने देने का दृश्य तो वाकई में अद्भुत लगा। एक इंदिरा आवास के लिए बूढी दादी का इस तरह से संघर्ष करना, वास्तव में गांव में यही सब होता है। और हां, दामाद जी। वहीं दंभ। वही पत्नी पर रोब। वहीं दामद जी। बस ।

 

वरिष्ठ पत्रकार के फेसबुक से साभार यह आलेख प्रकाशित है।

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