समाज दोषी या मां? झाड़ियों में मिली जिंदगी को पुलिस ने दिया सहारा
समाज दोषी या मां? झाड़ियों में मिली जिंदगी को पुलिस ने दिया सहारा
शेखपुरा में रविवार की सुबह रेलवे ट्रैक के किनारे झाड़ियों से आ रही बच्चे के रोने की आवाज ने लोगों को ठिठका दिया। कुछ ही देर में वहां भीड़ जुट गई। झाड़ियों के बीच एक नवजात पड़ा था—नाल भी पूरी तरह सूखी नहीं थी और उसके जन्म को महज कुछ घंटे ही हुए होने का अनुमान था। किसी ने उसे दुनिया में लाकर अपनाने के बजाय झाड़ियों में मरने के लिए छोड़ दिया था।
स्थानीय लोगों ने इसकी सूचना पुलिस को दी। सूचना मिलते ही शेखपुरा थाना की पुलिस मौके पर पहुंची और नवजात को झाड़ियों से सुरक्षित बाहर निकाला। ठंड और असुरक्षा के बीच जिंदगी से जूझ रहे इस मासूम को तत्काल सदर अस्पताल के नवजात शिशु देखभाल कक्ष (एसएनसीयू) में भर्ती कराया गया। चिकित्सक उसकी विशेष निगरानी में इलाज कर रहे हैं।
शेखपुरा थाना की अवर निरीक्षक सोनी कुमारी ने बताया कि नवजात बालक है और उसके जन्म के कुछ घंटे बाद ही उसे वहां छोड़ दिए जाने का अनुमान है। नवजात हसनगंज रेलवे क्रॉसिंग के पास स्थित एक बाइक शोरूम के समीप झाड़ियों से मिला। शोरूम संचालक ने सुबह दुकान खोलने के दौरान बच्चे के रोने की आवाज सुनी और पुलिस को सूचना दी।
मासूम के मिलने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है— दोषी समाज है या वह मां, जिसने अपने ही बच्चे को मौत के मुंह में छोड़ दिया? मजबूरी थी, सामाजिक भय था या कोई और वजह, यह जांच के बाद सामने आएगा। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या समाज ऐसी मां के लिए कोई रास्ता नहीं बना सका?
पुलिस ने बाल कल्याण समिति और बाल संरक्षण इकाई को भी सूचना दी है। इलाज के बाद नवजात को सरकारी संरक्षण में दत्तक ग्रहण केंद्र भेजा जाएगा।
जिसे किसी ने झाड़ियों में मरने के लिए छोड़ दिया, उसे पुलिस ने जिंदगी का एक और मौका दिया। शायद वर्दी का यही मानवीय चेहरा समाज को यह याद दिलाता है कि हर नवजात दोषी नहीं होता, उसे सिर्फ जीने का अधिकार चाहिए।
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