• Saturday, 24 October 2026
इतिहास में उपेक्षित रहे बिहार केसरी के योगदान को सामने लाने पर जोर : प्रो. आनंद वर्धन

इतिहास में उपेक्षित रहे बिहार केसरी के योगदान को सामने लाने पर जोर : प्रो. आनंद वर्धन

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इतिहास में उपेक्षित रहे बिहार केसरी के योगदान को सामने लाने पर जोर : प्रो. आनंद वर्धन 
 
पांच घंटे तक चला संवाद, इतिहास के उपेक्षित प्रसंगों पर हुई चर्चा
 
 बरबीघा, शेखपुरा
 
बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह का व्यक्तित्व किसी जाति या राजनीतिक सीमा में बंधा हुआ नहीं था। उनकी राजनीति के केंद्र में किसान, सामाजिक समरसता और बिहार का औद्योगिक विकास था। उनके विचारों और संघर्षों को व्यापक संदर्भ में समझने की जरूरत है। शनिवार को श्रीकृष्ण सिंह की जयंती पर श्रीकृष्ण रामरुचि कॉलेज, बरबीघा में आयोजित संवाद कार्यक्रम में भारतीय संग्रहालय संघ, नई दिल्ली के अध्यक्ष प्रो. आनंद वर्धन ने ये बातें कहीं।
‘श्रीकृष्ण सिंह : व्यक्तित्व, विचार और विरासत’ विषय पर आयोजित विमर्श में उन्होंने बिहार केसरी के जीवन से जुड़े कई ऐसे प्रसंगों का उल्लेख किया, जिनसे श्रोता उनके व्यक्तित्व के नए पहलुओं से परिचित हुए। उन्होंने कहा कि एक समय श्रीकृष्ण सिंह को जवाहरलाल नेहरू के बाद देश के प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदार के रूप में भी देखा जाता था। उनकी राजनीतिक दृष्टि, विकास की समझ और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता उन्हें विशिष्ट बनाती थी।
प्रो. वर्धन ने कहा कि श्रीबाबू के चिंतन में किसान और ग्रामीण समाज का विशेष स्थान था। वे स्वामी सहजानंद सरस्वती को अपना गुरु मानते थे और उनके विचारों से प्रभावित थे। चंपारण आंदोलन का उल्लेख करते हुए उन्होंने नील की खेती करने वाले किसानों के संघर्ष और उस दौर की परिस्थितियों पर भी चर्चा की।
 
जाति की सीमाओं से परे था श्रीबाबू का संघर्ष
 
प्रो. आनंद वर्धन ने कहा कि श्रीकृष्ण सिंह को जाति के संकीर्ण दायरे में बांधकर देखना उनके व्यापक योगदान को सीमित करना है। दरभंगा महाराज के विरोध में हुए आंदोलन में उनकी भागीदारी इसका उदाहरण है। उन्होंने अपने समाज के संपन्न वर्गों से अलग खड़े होकर दूसरे समाज के लोगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी। श्रीबाबू ने जाति, धर्म और राजनीतिक दलों के नाम पर समाज को बांटने वाली राजनीति को स्वीकार नहीं किया।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि श्रीकृष्ण सिंह की विकास संबंधी सोच केवल कृषि तक सीमित नहीं थी। औद्योगिक विकास को लेकर उनकी दृष्टि व्यापक और दूरदर्शी थी। पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव के लेखन का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि बिहार केसरी की औद्योगिक विकास संबंधी समझ किसी बड़े अर्थशास्त्री जैसी थी।
 
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इतिहास में श्रीबाबू की भूमिका को उचित स्थान देने पर जोर
 
संवाद के दौरान इतिहास लेखन में श्रीकृष्ण सिंह की भूमिका की उपेक्षा का सवाल भी उठा। प्रो. वर्धन ने कहा कि असहयोग आंदोलन की असफलता के संदर्भ में पंडित जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस की टिप्पणियों का उल्लेख किया जाता है, लेकिन श्रीबाबू के विचारों को अपेक्षित स्थान नहीं मिला। उन्होंने ऐसे प्रसंगों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता जताई, ताकि स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार के योगदान और उसके नेताओं की भूमिका को समुचित रूप से समझा जा सके।
 
कार्यक्रम का उद्घाटन डॉ. सहजानंद सिंह ने किया। छपरा विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. शिशिर कुमार सिंह और श्रीकृष्ण सेवा सदन, मुंगेर के सचिव प्रो. प्रभात कुमार ने भी अपने विचार रखे। कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया।
 
इस अवसर पर कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. रामविलास प्रसाद सिंह, डॉ. शिव भगवान गुप्ता, डॉ. कृष्ण मुरारी प्रसाद सिंह, डॉ. फैजल अरशद, डॉ. मुनेश्वर प्रसाद, डॉ. वीरेंद्र पांडे, डॉ. किरण देवी, उपेंद्र सिंह और अनिल कुमार सहित अन्य लोगों ने ‘केसरी’ पत्रिका का लोकार्पण किया।
 
करीब पांच घंटे तक चले कार्यक्रम में बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों और शिक्षाविदों ने भाग लिया। वक्ताओं के विचारों पर श्रोताओं की उत्साहपूर्ण प्रतिक्रिया से सभागार बार-बार तालियों से गूंज उठा। मंच संचालन प्रो. मनीष कुमार ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो. पंकज कुमार ने दिया।
 
समारोह में श्रीकृष्ण सिंह के प्रपौत्र अनिल शंकर, माउर निवासी रविरंजन कुमार, साई कॉलेज के अध्यक्ष डॉ. अंजेश कुमार और अधिवक्ता अंजनी कुमार को अंगवस्त्र एवं स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया।
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