• Friday, 09 December 2022
गोबर का यम दीया जलाने की कहां है परंपरा , क्या है कारण

गोबर का यम दीया जलाने की कहां है परंपरा , क्या है कारण

गोबर का यम दीया जलाने की क्यों है परंपरा 

News Desk 

धनतेरस के दिन जहां भगवान धन्वंतरी, कुबेर, माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है और इसको लेकर उत्सव का माहौल रहता है। वहीं इसी रात यमराज को प्रसन्न करने के लिए भी परंपरागत रूप से दीपक जलाने की परंपरा है। यमराज को प्रसन्न करने के लिए दीपक जलाने की परंपरा को यम दीपक नाम दिया गया है। यम दीपक जलाने की परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग है।

 

 किसी क्षेत्र में चौमुखी दीपक जलाया जाता है तो कहीं कहीं एक मुखी मिट्टी का ही दीपक जलाने की परंपरा है। कई जगहों पर पुराने दीपक को जलाया जाता है तो कुछ जगहों पर नए दीपक जलाए जाते हैं। वहीं बिहार के शेखपुरा जिले के बरबीघा के क्षेत्र में यम दीपक जलाने की अलग परंपरा है । इस दिन यहां गोबर का दीपक बनाकर रात्रि में जलाया जाता है। यमराज को प्रसन्न करने के लिए दीपक को दक्षिण रखा जाता है।

यमराज को प्रसन्न करने के लिए पुराण काल से परंपरा

 इसको लेकर धर्म शास्त्र के ज्ञाता एवं विष्णु धाम सामस विष्णु धाम मंदिर के सचिव अरविंद मानव चाहते हैं कि धर्म शास्त्रों के अनुसार यमराज की पूजा कार्तिक महीने के त्रियोदशी के दिन करने की परंपरा है। इस रात यमराज को प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग जगहों पर दीपक जलाए जाते हैं । कहीं चौमुखी दीपक तो कहीं मिट्टी के दीए जलाते हैं। कुछ क्षेत्रों में गोबर का दीपक जलाने की परंपरा है। मान्यता है कि यमराज को प्रसन्न करने के लिए ऐसा किया जाता है। रात के अंधेरे में घर के बाहर महिलाओं के द्वारा दीपक जलाया जाता है और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा जाता है।

अरविंद मानव बताते हैं कि गोबर का दीया बनाने की भी अपनी परंपरा है । यम द्वितीया तक 5 दिनों तक यह कार्यक्रम चलता है। कार्तिक माह के त्रियोदशी से लेकर द्वितीया तक यमराज की पूजा की परंपरा है । यम द्वितीया के दिन यम : यमी की गोबर की बनी प्रतीक प्रतिमा कुटी जाती है इसी को लेकर गोबर का दिया जलाने की परंपरा कुछ जगहों पर है। दीया को दक्षिण रखने की भी परंपरा है। माना जाता है कि पितृ और यम का बास दक्षिण दिशा में है।

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